पंच बालयति तीर्थंकर पूजन



कवि श्री अरदास जी

(दोहा)

श्री जिन पंच अनंग-जित, वासुपूज्य मल्लि नेम |

पारसनाथ सु वीर अति, पूजूँ चित-धरि प्रेम ||

ओं ह्रीं श्री पंचबालयति-तीर्थंकरा: अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)

ओं ह्रीं श्री पंचबालयति-तीर्थंकरा: अत्र तिष्ट तिष्ट ठ: ठ:! (स्थापनम्)

ओं ह्रीं श्री पंचबालयति-तीर्थंकरा: अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्)

 

अथाष्टक

शुचि शीतल सुरभि सुनीर, लायो भर झारी,

दु:ख जामन मरन गहीर, या कों परिहारी |

श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अति,

नमूं मन वच तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति ||

ओं ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर पंचबालयति- तीर्थंकरेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।

 

चंदन केशर कर्पूर, जल में घसि आनो |

भव-तप-भंजन सुखपूर, तुमको मैं जानो ||

श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अति,

नमूं मन वच तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति ||

ओं ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर पंचबालयति- तीर्थंकरेभ्यो संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२।

 

वर अक्षत विमल बनाय, सुवरण-थाल भरे |

बहु देश-देश के लाय, तुमरी भेंट धरे ||

श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अति,

नमूं मन वच तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति ||

ओं ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर पंचबालयति- तीर्थंकरेभ्यो अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।३।

 

यह काम सुभट अतिसूर, मन में क्षोभ करो |

मैं लायो सुमन हुजूर, या को वेग हरो ||

श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अति,

नमूं मन वच तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति ||

ओं ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर पंचबालयति- तीर्थंकरेभ्यो कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।४।

 

षट् रस पूरित नैवेद्य, रसना-सुखकारी |

द्वय कर्म वेदनी छेद, आनंद ह्वै भारी ||

श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अति,

नमूं मन वच तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति ||

ओं ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर पंचबालयति- तीर्थंकरेभ्यो क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।

 

धरि दीपक जगमग ज्योति, तुम चरणन आगे |

मम मोहतिमिर क्षय होत, आतम गुण जागे ||

श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अति,

नमूं मन वच तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति ||

ओं ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर पंचबालयति- तीर्थंकरेभ्यो मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।६।

 

ले दशविधि धूप अनूप, खेऊँ गंधमयी |

दशबंध दहन जिनभूप, तुम हो कर्मजयी ||

श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अति,

नमूं मन वच तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति ||

ओं ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर पंचबालयति-तीर्थंकरेभ्यो अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।७।

 

पिस्ता अरु दाख बदाम श्रीफल लेय घने |

तुम चरण जजूँ गुणधाम द्यो सुख मोक्ष तने ||

श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अति,

नमूं मन वच तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति ||

ओं ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर पंचबालयति- तीर्थंकरेभ्यो मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।८।

 

सजि वसुविधि द्रव्य मनोज्ञ, अरघ बनावत हूँ |

वसुकर्म अनादि संयोग ताहि नशावत हूँ ||

श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अति,

नमूं मन वच तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति ||

ओं ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर पंचबालयति- तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।९।

 

जयमाला

(दोहा)

बाल ब्रह्मचारी भये, पाँचों श्री जिनराज |

तिनकी अब जयमालिका, कहूँ स्व-पर हितकाज ||

 

(पद्धरि छन्द)

जय जय जय जय श्री वासुपूज्य, तुम-सम जग में नहिं और दूज |

तुम महाशुक्र-सुरलोक छार, जब मात गर्भ-माँहीं पधार ||

 

षोडश सपने देखे सुमात, बल अवधि जान तुम जन्म तात |

अति हर्ष धार दंपति सुजान, बहुदान दियो याचक-जनान ||

 

छप्पन कुमारिका तबै आन, तुम मात-सेव बहुभक्ति ठान |

छ: मास अगाऊ गर्भ आय, धनपति सुवरन-नगरी रचाय ||

 

तुम तात महल आंगन मँझार, तिहुँकाल रतनधारा अपार |

वरषाए षट् नवमास सार, धनि जिन-पुरुषन नयनन निहार ||

 

जय ‘मल्लिनाथ’ देवन सुदेव, शत-इन्द्र करत तुम चरण-सेव |

तुम जन्मत ही त्रय ज्ञान धार, आनंद भयो तिहुँजग अपार ||

 

तब ही ले चहुँ विधि देव-संग, सौधर्म इन्द्र आयो उमंग |

सजि गज ले तुम हरि गोद आप, वन पाँडुक शिल ऊपर सुथाप ||

 

क्षीरोदधि तें बहु देव जाय, भरि जल घट हाथों हाथ लाय |

करि न्हवन वस्त्र-भूषण सजाय, दे मात नृत्य ताँडव कराय ||

 

पुनि हर्ष धार हृदय अपार, सब निर्जर तब जय-जय उचार |

तिस अवसर आनंद हे जिनेश, हम कहिवे समरथ नहीं लेश ||

 

जय यादवपति श्री ‘नेमिनाथ’, हम नमत सदा जुगजोरि हाथ |

तुम ब्याह समय पशुअन पुकार, सुनि तुरत छुड़ाये दया धार ||

 

कर कंकण अरु सिर मोर बंद, सो तोड भये छिन में स्वच्छंद |

तब ही लौकान्तिक-देव आय, वैराग्य वर्द्धनी थुति कराय ||

 

तत्क्षण शिविका लायो सुरेन्द्र, आरूढ़ भये ता पर जिनेन्द्र |

सो शिविका निजकंधन उठाय, सुर नर खग मिल तपवन ठराय ||

 

कच लौंच वस्त्र भूषण उतार, भये जती नगन मुद्रा सुधार |

हरि केश लेय रतनन पिटार, सो क्षीर उदधि माहीं पधार ||

 

जय ‘पारसनाथ’ अनाथ नाथ, सुर-असुर नमत तुम चरण माथ |

जुग-नाग जरत कीनो सुरक्ष, यह बात सकल-जग में प्रत्यक्ष ||

 

तुम सुरधनु-सम लखि जग असार, तप तपत भये तन ममत छाँड़ |

शठ कमठ कियो उपसर्ग आय, तुम मन-सुमेरु नहिं डगमगाय ||

 

तुम शुक्लध्यान गहि खड्ग हाथ, अरि च्यारि घातिया करे सुघात |

उपजायो केवलज्ञान भानु, आयो कुबेर हरि वच प्रमाण ||

 

की समोशरण रचना विचित्र, तहाँ खिरत भर्इ वाणी पवित्र |

मुनि सुर नर खग तिर्यंच आय, सुनि निज निज भाषा बोध पाय ||

 

जय ‘वर्द्धमान’ अंतिम जिनेश, पायो न अंत तुम गुण गणेश |

तुम च्यारि अघाती कर महान्, लियो मोक्ष स्वयं सुख अचलथान ||

 

तब ही सुरपति बल अवधि जान,सब देवन युत बहु हर्ष ठान |

सजि निजवाहन आयो सुतीर, जहँ परमौदारिक तुम शरीर ||

 

निर्वाण महोत्सव कियो भूर, ले मलयागिर चंदन कपूर |

बहुद्रव्य सुगंधित सरस सार, ता में श्री जिनवर वपु पधार ||

 

निज अगनि कुमारिन मुकुट नाय, तिहँ रतनन शुचि ज्वाला उठाय |

तस सर माँहिं दीनी लगाय, सो भस्म सबन मस्तक चढ़ाय ||

 

अति हर्ष थकी रचि दीप माल, शुभ रतन मर्इ दश-दिश उजाल |

पुनि गीत-नृत्य बाजे बजाय, गुणगाय-ध्याय सुरपति सिधाय ||

 

सो थान अबै जग में प्रत्यक्ष, नित होत दीपमाला सुलक्ष |

हे जिन तुम गुण महिमा अपार, वसु सम्यक् ज्ञानादिक सुसार ||

 

तुम ज्ञान माँहिं तिहुँलोक दर्व, प्रतिबिम्बित हैं चर अचर सर्व |

लहि आतम अनुभव परम ऋद्धि, भये वीतराग जग में प्रसिद्ध ||

 

ह्वे बालयती तुम सबन एम, अचरज शिव कांता वरी केम |

तुम परम शांति मुद्रा सुधार, किया अष्ट कर्म रिपु को प्रहार ||

 

हम करत वीनती बार-बार, करजोर स्व-मस्तक धार-धार |

तुम भये भवोदधि पार-पार, मोको सुवेग ही तार-तार ||

 

अरदास दास ये पूर-पूर, वसु-कर्म-शैल चकचूर-चूर |

दु:ख-सहन दास अब शक्ति नाहिं, गहि चरण-शरण कीजे निवाह ||

 

(चौपाई)

पाँचों बालयती तीर्थेश, तिनकी यह जयमाल विशेष |

मन वच काय त्रियोग सम्हार, जे गावत पावत भव-पार ||

ओं ह्रीं श्री पंचबालयति-तीर्थंकरजिनेन्द्रेभ्य: जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

 

(दोहा)

ब्रह्मचर्य सों नेह धरि, रचियो पूजन ठाठ |

पाँचों बालयतीन का, कीजे नितप्रति पाठ ||

।। इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।