जिनधर्म से है प्रेम तो बस भावना ये भाईये...



जिनधर्म से है प्रेम तो बस भावना ये भाईये ।

देह जाये तो भले जिनधर्म रहना चाहिये ।।

जिनमार्ग की हो प्रभावना जिनध्वजा यूं लहराईये ।

देह जाये तो भले जिनधर्म रहना चाहिये ।।

 

वीतरागी अहो जिनेश्वर धन्य वे मुनिराज हैं ।

निरपेक्ष सहज स्वरूप दर्शाते करें उपकार हैं ।।

मंगलमयी प्रभु शरण पाके जगोत्तम हो जाइये ।

देह जाये तो भले जिनधर्म रहना चाहिये ।।

 

जिनाज्ञा के भंग होने का हदय में भय सदा ।

ऐसे मुमुक्षु नहीं करते मार्ग उल्लंघन कदा ।।

आत्महित का लक्ष्य ले शिवपंथ में बढ़ जाईये ।

देह जाये तो भले जिनधर्म रहना चाहिये ।।

 

सत्य है शिवमयी सत्पथ बनो इसके पक्षधर ।

मोह अच्छे का बुरा है जान लो है विज्ञवर ।।

मिथ्यात्व बैरी अंश भी है बुरा जान नशाईये ।

देह जाये तो भले जिनधर्म रहना चाहिये ।।

 

अनादि निधन वस्तु सब सीमा में करती परिणमन ।

कर्ता न धर्ता कोई है, सब द्रव्य अपने में मगन ।।

कर्त्तत्व भार उतारकर निर्भार अब हो जाईये ।

देह जाये तो भले जिनधर्म रहना चाहिये।।