सती चंदनबाला कथा



सती चंदनबाला कथा 

    चम्पानगरी में दधिवाहन राजा राज्य करते थे| उनकी पत्नी का नाम धारिणी तथा पुत्री का नाम वसुमती था| एक बार शत्रु शतानीक ने चम्पानगरी पर आक्रमण कर लूटपाट मचा दी| आकस्मिक हुए आक्रमण का मुकाबला नहीं कर पाने से राजा दधिवाहन जंगल में भाग गए| शत्रु सेना के एक सारथी ने धारिणी तथा वसुमती का अपहरण कर लिया| जब सारथी एकांत जंगल में पँहुचा तो उसने अपनी कुत्सित भावना रानी के सामने प्रकट की|

    रानी ने अपने शील की रक्षा के लिए जीभ खींच कर अपने प्राण त्याग दिए| तत्पश्चात सारथी ने वसुमती को कौशाम्बी नगरी में बेचने के लिए चौराहे पर खड़ा कर दिया| कौशाम्बी नगरी में धन्ना सेठ नमक एक समृद्धशाली व्यापारी रहता था| उसने मुंहमाँगा दाम देकर वसुमती को खरीद लिया और उसका नाम चंदना रख दिया| धन्ना सेठ चंदना का पालन पोषण पुत्रीवत बड़े स्नेह से करने लगा|

    सेठ की पत्नी मूला, चंदना से बहुत इर्ष्या करती थी| उसके मन में यह संदेह उत्पन्न हो गया की सेठ चंदना के प्रेम में बुरी तरह से फंस कर मेरी उपेक्षा कर रहा है| अत: मूला चंदना को प्रताड़ित करने व बदला लेने की भावना रख अवसर की प्रतीक्षा करने लगी|

    संयोगवश एक बार सेठ अपने धंधे से कौशाम्बी से बहार गए हुए थे| मूला जिस अवसर की तलाश में थी, उसे वह अवसर मिल गया| उसने चंदना के बाल कटवा कर, हाथों-पैरों में बेड़ी डाल कर, मात्र एक वस्त्र के अलावा सरे वस्त्र उतार कर उसे तहखाने में डलवा दिया और मूला अपने मायके चली गई| चंदना बिना अन्न पानी के कष्ट से समय बिताने लगी| तीन दिन बाद सेठ अपने घर वापिस आया और चंदना को नहीं देख कर आश्चर्य में पड़ गया| वह चारों ओर उसकी खोज करने लगा| आखिर तहखाने की और उसका ध्यान गया जहाँ चंदना का क्षीण स्वर उसे सुनाई दिया| उसने दरवाजा खोला तो चंदना की दयनीय स्थिति देख कर उसका ह्रदय रो पड़ा| पर आश्चर्य था की चंदना के मुखमंडल पर क्रोध प्रतिशोध या वेदना के चिन्ह नहीं थे| सेठ ने चंदना को जब उसकी दुर्दशा का कारण पुछा तो चंदना ने कहा " पिताजी! इसमें किसी का दोष नहीं है | यह तो मेरे संचित अशुभ कर्म हैं, इसलिए आप न तो दुःख करें और न किसी पर क्रोध करें|"

    सेठ ने मूला को पुकारा, पर वो वहाँ नहीं थी| उसे वहाँ न पाकर सेठ सब समझ गया| अब सेठ चंदना के खाने के लिए कुछ तलाश करने लगा|  उसे छाजले में उड़द के बाकुले(छिलके) के अलावा कुछ और दिखाई नहीं दिया| सेठ ने छाज चंदना के हाथों में देकर कहा - "बेटी ! मैं बाज़ार से तुम्हारे खाने तथा बेड़ी काटने वाले को लाता हूँ तब तक तू बाकुले ग्रहण कर|"

    सेठ के जाने पर चंदना तलघर की देहली में खड़ी होकर देखने लगी की कोई महात्मा आए तो उन्हें बहराकर फिर मुंह में डालूं| सच्ची भावना कभी खाली नहीं जाती| संयोगवश उस समय भगवान महावीर तेरह बोल का अभिग्रह लेकर आहार के लिए भ्रमण कर रहे थे| तेरह अभिग्रह इस प्रकार से है-

 

1.कोई राजकुमारी हो

2.अविवाहित हो

3.सदाचारिणी हो

4.निरपराध होते हुए भी बंधनग्रस्त हो

5.उसका सर मुंडित हो

6.उसके शरीर पर केवल काछ लगी हो

7.अठ्ठमभक्त (तेला) की तपस्या हो गई हो

8.पारणे के लिए सूप में बाकुले लिए हो

9.एक पैर देहली के बाहर व एक पैर देहली के अन्दर हो

10.ऐसी अवस्था में वह न घर के अन्दर हो, न बाहर हो

11.दान देने हेतु किसी अतिथि की प्रतीक्षा कर रही हो

12.वह प्रसन्न वदना हो

13.नेत्रों में आंसू हो

इस तरह के जटिल अभिग्रह के चलते उनको उपवास करते पाँच मास और पच्चीस दिन हो गए थे| कौशाम्बी नगर में घूमते हुए प्रभु चंदना के घर की ओर चले और यहाँ आकर उन्होंने देखा के अभिग्रह के बारह बोल (१ से १२) यहाँ मिल गए केवल नेत्रों में आंसू नहीं थे| प्रभु ज्योंही वापिस जाने लगे, चंदना की आँखों से आंसू की बूंदें गिरने लगी की घर आई गंगा को यों ही वापिस जाते देख उसका ह्रदय और जल उठा, भक्त प्रेम के जोर पर प्रभु को वापिस होना पड़ा तथा उन्होंने चंदना के हाथों से बकुले ग्रहण किये|

चंदना के हाथों की हथकड़ियाँ और पैरों की बेड़ियाँ रत्न जडित कंगन व नुपुर के रूप में परिणित हो गए| अर्धनग्न तन दिव्य वस्त्राभुषणों से सुशोभित हो गया| देवों ने पञ्च दिव्य प्रकट किये| स्वर्ण व रत्नों की वर्षा हुई| वातावरण में कुछ और ही रंग आ गया| मगर चंदना के लिए इन सबका कोई मोल नहीं था| वह तो प्रभु के दिव्य रूप को ध्यान में लिए तन्मय बन गई थी| सेठ, सेठानी व नगरजनों पर चंदना के दान का अमिट असर हुआ और चारों ओर उसकी जय जयकार होने लगी|

 

कालांतर में भगवान को जब केवलज्ञान प्राप्त हुआ, तब चंदना ने भी उनके चरणों में संयम ग्रहण किया तथा ३६००० साध्वियों की प्रमुख कहलाई| अंत में कर्मक्षय करके उसने मुक्ति प्राप्त की|