भावना द्वात्रिंशतिका (सामायिक पाठ)



 

सत्त्वेषु मैत्रीं गुणिषु प्रमोदं, क्लिष्टेषु जीवेषु कृपा-परत्वम्‌।

माध्यस्थभावं विपरीतवृत्तौ,सदा ममात्मा विदधातु देव ॥1॥

 

शरीरत: कर्त्तुमनन्त-शक्ति, विभिन्‍नमात्मानमपास्त-दोषम्‌।

जिनेन्द्र! कोषादिव खड़्ग-यष्टिं,तव प्रसादेन ममास्तु शक्ति: ॥2॥

 

दुःखे सुखे वैरिणि बन्धुवर्गं, योगे वियोगे भवने ने वा।

निराकृताशेष-ममत्वबुद्धे: समं मनोमेस्तु सदापि नाथ ! ॥3॥

 

मुनीश!लीनाविव कीलिताविव, स्थिरौ निखाताविव बिम्बिताविव।

पादौ त्वदीयौ मम तिष्ठतां सदा, तमोधुनानौ हृदि दीपकाविव ॥4॥

 

एकेन्द्रियाद्या यदि देव! देहिन:, प्रमादत: संचरता इतस्तत:।

क्षता विभिनना मिलिता निपीडितास्‌, तदस्तु मिथ्या दुरनुष्ठितं तदा ॥5॥

 

विमुक्तिमार्ग-प्रतिकूलवर्तिना, मया कषायाक्षवशेन दुर्धिया।

चारित्रशुद्धेर्यदकारि लोपनं, तदस्तु मिथ्या मम दुष्कृतं प्रभो! ॥6॥

 

विनिन्दनालोचन-गर्हणैरहं, मनोवचःकायकषाय-निर्मितम्‌।

निहन्मि पापं भवदुःखकारणं, भिषग्विषं मन्त्रगुणैरिवाखिलम्‌ ॥7॥

 

अतिक्रमं यद्विमतेव्यरतिक्रमं, जिनातिचारं सुचरित्रकर्मणः

व्यधामनाचारमपि प्रमादत:, प्रतिक्रमं तस्य करोमि शुद्धये ॥8॥

 

क्षतिं मनः शुद्धि-विधेरतिक्रमं, व्यतिक्रमं शील-व्रतेर्वीलङ्घनं ।

प्रभोतिचारं विषयेषु वर्तनं वदन्त्यनाचारमिहातिसक्तताम्‌ ॥9॥

 

यदर्थमात्रा-पदवाक्यहीनं, मया प्रमादाद्यदि किञ्चनोक्तम्‌।

तन्मे क्षमित्वा विदधातु देवी, सरस्वती केवलबोधलब्धिम्‌ ॥10॥

 

बोधि: समाधि: परिणामशुद्धि:, स्वात्मोपलब्धि: शिवसौख्यसिद्धि:।

चिन्तामणिं चिन्तितवस्तुदाने, त्वां वन्द्यमानस्य ममास्तु देवि! ॥11॥

 

यः स्मर्यते सर्वमुनीन्द्रवृन्दे, र्य: स्तुयते सर्वनरामरेन्द्रे:

यो गीते वेदपुराणशास्त्रैः, स देवदेवो ह्रदये ममास्तां ॥12॥

 

यो दर्शनज्ञानसुखस्वभाव:, समस्त संसार-विकारबाह्य:।

समाधिगम्य: परमात्मसंज्ञ:, स देवदेवो ह्रदये ममास्ताम् ॥13॥

 

निषूदते यो भवदुःखजालं,  निरीक्षते यो जगदन्तरालम।

योन्तर्गतो योगिनिरीक्षणीय:, स देवदेवो ह्रदये ममास्ताम् ॥14॥

 

विमुक्तिमार्गप्रतिपादको यो, यो जन्ममृत्युव्यसनातीत:।

त्रिलोकलोकी विकलोकलंक: स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ‌॥15॥

 

क्रोडीकृताशेष-शरीरिवर्गा, रागादयो यस्य न सन्ति दोषा:।

निरिन्द्रियो ज्ञानमयोनपाय:, स देवदेवो हृदये ममास्ताम्‌ ॥16॥

 

यो व्यापको विश्वजनीनवृत्ते, सिद्धो विबुद्धो धुतकर्मबन्ध:।

ध्यातो धुनीते सकलं विकारं, स देवदेवो हृदये ममास्ताम् 17॥

 

 न स्पृश्यते कर्मकलंकदोषै यो ध्वांतसङ्घेरिव  तिग्मरशिम:।

निरंजनं नित्यमनेकमेकं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥18॥

 

विभासते यत्र मरीचिमाली, न विद्यमाने भुवनावभासी।

स्वात्मस्थितं बोधमयप्रकाशं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥19॥

 

विलोक्यमाने सति यत्र विश्व, विलोक्यते स्पष्टमिद विविक्तम्‌।

शुद्धं शिवं शान्तमनाद्यनन्तं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥20॥

 

येन क्षता मन्मथमानमूर्च्छा, विषादनिद्राभ-शोक-चिंता:।

क्षतोनलेनेव तरुप्रपञ्चस‌, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥21॥

 

 न संस्तरोश्मा न तृणं न मेदिनी, विधानतो नो फलको विनिर्मित:।

तो निरस्ताक्षकषाय-विद्वि:, सुधीभिरात्मैवसुनिर्मलो मत: ॥22॥

 

संस्तरो भद्र! समाधिसाधनं, न लोकपूजा न च सङ्घमेलनम्‌।

तस्ततोध्यात्मरतो भवानिशं, विमुच्य सर्वापि बाह्यवासनाम्‌ ॥23॥

 

 सन्ति बाह्मा मम केचनार्था भवामि तेषां न कदाचनाहम्‌।

इत्थं विनिश्चित्य विषुच्य बाह्यं, स्वस्थ: सदा त्वं भव भद्र! मुक्तयै ॥24॥

 

आत्मानमात्मन्यवलोक मानस्‌ त्वं दर्शनज्ञानययों विशुद्ध:।

एकाग्रचित्त: खलु त्र तत्र, स्थितोपि साधुर्लभते समाधिम्‌ ॥25॥

 

एक: सदा शाश्वतिको ममात्मा, विनिर्मल: साधिस्वभाव:।

हिर्भवा: सन्त्यपरे सस्ता, नशाश्वता: कर्मभवा: स्वकीया: ॥26॥

 

यस्यास्ति नेक्यम वपुषापि सार्द्धं, तस्यास्ति किं पुत्र-कलत्र-मित्रे:।

पृथक्कृते चर्मणि रोकूपा:, कुतो हि तिष्ठन्ति शरीरमध्ये ॥27॥

 

संयोगतो दुःखमनेकभेदं, तोशनुते जन्मवने शरीरी।

तत्स्त्रीधासौ परिवर्जनीयो, यियासुना निर्वृत्तमात्मनीनाम्‌ ॥28॥

 

सर्व निराकृत्य विकल्प-जालं, संसार-कान्तार निपातहेतुम्‌।

विविक्तमात्मानमवेक्षय-माणो, निलीयसे त्वं परमात्मतत्वे ॥29॥

 

स्वयं कृतं कर्म दात्मना पुरा, फल तदीयं लभते शुभाशुभम।

परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटं, स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा ॥30॥

 

निजार्जितं कर्म विहाय देहिनो, न कोपि कस्यापि ददाति किञ्चन।

विचारयन्नेव-मनन्यमानस:, परो ददातीति विमुञ्च शेमुषीम्‌ ॥31॥

 

येः परमात्मामितगतिवन्ध:, सर्वविविक्तो भृशमनवद्य:।

शश्वदधीतो मनसि लभन्ते, मुक्तिनिकेतं विभववरं ते ॥32॥

इति द्वात्रिंशतावृत्तै:, परमात्मानमीक्षते।

योनन्यगत-चेतस्को, यात्यसौ पदमव्यम्‌॥

 

 

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