श्री आदिवीर शंकर स्तोत्र (संस्कृत)



रचयिता - श्रमण रत्न मुनि श्री १०८ आदित्यसागर जी महाराज

प्रचण्ड चण्ड दण्ड पिण्ड खण्ड खण्ड खण्डनं
न दण्डिकं सुपण्डितं च गण्ड घण्डु गुण्डकं।
न गण्डकं न तुण्डिलं तु दण्ड गुण्डिताश्रयं
प्रणाम मादितीर्थ मादिनाथ मादिशंकरं ।।१।।

अजेयदेव जैन जीवभावरक्त जीवनं
जितेन्द्रियं जिताहवं जीतात्मदेवं जोषणम।
अनात्मभाव जित्वरं च जन्म मृत्युजित्वरं  
अजेयकर्मभूपतिन पराजितं जयाजितं ।।२।।

सुभावनो च भावशून्य भावविद विभावन
भविष्यभाव भावकश्च भावरूप भावकः।
असम्भवो न संभवो हि संभवो च संभव
भवादृशो भवात्परो भवंहरो न सम्भवः ।।३।।

नितान्त नन्दनं च नन्दनं च नन्दिकेश्वरं
नरं नरेश निर्मदं नरी गिरीह नायकं।
नरामरादि वंद्यकं निजात्मनो निबोधकं
नमामि चाभिनन्दनं च नातिवाद नन्दथुं ।।४।।

दरिद्र दर्प धर्ष धर्त्र धृष्ट धात्रतशच्युतं
धुरंधरं धनिष्ठ धृत्व धृष्णु धुर्म संयुतं।
प्रशांत शुद्ध देह वाक्य चित्त चेतना युतं
सुबद्धिदं च तं च तं च पं च कं च पंचमं ।।५।।

सुपद्मनाथ पद्मनाथ पद्मदेव देवतं
सुपद्मबन्धु पद्मगन्ध पद्मपाणि पद्मदम।  
सुपद्मवर्ण पादपद्म पद्म पद्मलान्छन
परात्म पद्मतीर्थकं च पद्मवारवन्दनं ।।६।।

सुपार्श्व भाग युक्त तीर्थकारकं सुवर्णकं
सुपार्श्ववर्ति भव्यसर्व पापपंक भंजकं।
सुपारिपार्श्व पारिपार्श्विका परिस्थितं शलं
सुपार्श्विकं नमाम्यपार्श्वकं सुपार्श्वतीर्थकं ।।७।।

अमूर्तजीवचंद्र चंद्रतुंड चंद्रलांछनं
सुचंद्र! चंद्र चंदिरम च चन्द्रमाश्च चंद्र्कः।
सुचारु चन्द्रचर्य चर्चितारचितं च चंद्रिलं
जिनेन्द्र चंद्र चन्द्रनाथ तीर्थकारमीश्वरं ।।८।।

पुनीत पुष्कलं च शुभ्ररश्मिपुष्प वर्णकं
सुपुण्यबोध पुष्पितं च पुष्प केतु मर्दनं।
सुपुष्पपुष्पसंयुतं च पुष्प रेणु गंधकं
सुपुष्पदन्त पुष्पदंत पुष्पपुज्य वन्दनं ।।९।।

विशाल शील शीलशालिनं च शीतलप्रदं
श्याच्च शायकाद शालिनं शिवं च शिल्पिनं।
अशीतशीतयोग शालिनं च शीत शीतलं
नमामि शीतलाच्च शीतलं च शील शीलितं ।।१०।।

अढाटडं त्रिलोक तारकोडुपापटं पटुं
त्रिपिष्ठ तीर्थ तैर्थिकं त्रिचक्षुसं सुतैतिलं।
तरस्वतं तु तर्ककं तितिक्षु तीक्ष्ण तार्किकं
त्रियोगतो हि नोमि श्रेयसं जिनं जिनेश्वरं ।।११।।

वसुंधरावसुं वसुंधरावरं सु सुन्दरं
वयोवरं वरं वचं वशंवदं वनेवसं।
वरप्रदं पदप्रदं सुवातवस्तुदं वदं
सदा हि पूज्यामि वासुपूज्य पूज्य पूज्यकं ।।१२।।

विकारितच्युतं विचेष्टीतच्युतं विटच्युतं  
विमोक्षदं निजात्मदेवकेवलाद्धी कासकं।
विहिनवासनं विदं विकर्षणं विमर्दकं
त्रयोदशं दिवाकरं जिनेन्द्रदेव निर्मलं ।।१३।।

अचिन्त्य सौख्यदं विभुं विचिन्त्य तत्व शोधकं
विचेतनं सचेतनं विचक्षणं विचारकं।
विभाव भाव नाशकं स्वभाव भाव दायकं
अनंतबोध वीर्यदं नमाम्यनतं चेतनं ।।१४।।

सुधर्मयुक्तसद्धनेस्त मिस्रनाशकं धवं
धनस्य लोभवर्जितं च धेय धारणं ध्रुवं।
विधर्मभाव धर्ष धाषट्र्य धोतकं सुधार्मिंणं
नमामि धर्मदेव धर्मनाथ धार्म धार्मिकं ।।१५।।

प्रशांतकाम शांत शान्तिदं प्रशान्तिदं शमं
प्रशांतबाध शासनं प्रशंसितं प्रशामदं।
निजात्मशान्ति शापितं च शांतिदूत शान्तिकं
 ददातु शान्तिमीशमाशु शांतिनाथ! शंतनो!।।१६।।

पदत्रयस्य शालिनं नरामरारिसेवितं
कुंलीन कुंडीरं कुतूहलं च साधुकुंजरं।
कृतार्थशासनस्य संकुमार यूँ च कुथकं
मुनीन्द्र कुंथुनाथ सर्वजीवनाथ तीर्थकं ।।१७।।  


परारि रागरज्जुसंपदस्थ चक्रधारकः
पुनश्च धर्म चक्रधारको नरेशसेवितः।
परस्य संपराभवः परंतपं परातपरं
नमामि नारसारजोऽरनाथतीर्थ चक्रकं ।।१८।।   

अबाल्य बल्य बल्य मोहमल्लमान भंजनं
सजल्लमल्ल मुलिकं ललाम जल्प चातुरं।
विशल्य मल्ल कल्प कल्य कल्य काल्य मेलनं
सुमल्लिगंध मल्लिनाथ मल्लसाधु वन्दनं ।।१९।।

सुदीर्घ कीर्ति तीर्थकार पंचगुप्तलांछनं
निजात्म तीर्थ लब्ध्नार्थ सुव्रतानि धारकं।
विचित्र वर्तमान काल वंदितं सुतीर्थकं
महाव्रतं च सुव्रतं ददं सुसाधुसुव्रतं ।।२०।।

नमो नमो नमो नमो नमस्यनाय नायकं
नियाम नैमयं नु निर्निमित्तमित्र नर्मदं।
निदर्शनं नहुष्क नाग नारदैर्नमस्कृतं
नमोगुरुं नमस्कृतिं नमोस्तु तं च मि नमिम ।।२१।।

अरिष्टनेमिनाथ! नेमिने! निमे! नुते! मुने!
गरिष्ठ-पुष्ट-पुष्टिदं बलिष्ठ पौष्टिक प्रदः।
समस्त विष्टपे निकृष्टवसनाग वर्जितो
विशिष्ट शिष्ट शिष्टहार रिष्टको विशिष्टकः ।।२२।।

विरोधतश्च यो नभस्वरैः स्थिरश्च संकटे
तड्ट तड्ट तड्टतड़न्निनादकैरभयंकरे।
निजात्मशुद्धमंदिरे ध्रुवे वसेच्च पार्श्व! मे
समत्वमूर्ति पार्श्वनाथ! काशिपार्थ नन्दनं ।।२३।।

महत्तरं महानुभाव मोक्षमार्ग मार्गिकं
महार्णवं महन्त मंगलं महार्ह माठरं।
ममात्म मार्जनं महालयं मराल मार्मिकं
नमोस्तु मन्त्रतो महा महात्मवीर शंकरं ।।२४।।

पठेत्कृतं विशुद्ध नंदनेन शासकस्तुतिं
भवेत् रमरन्ब्रुवज्जनः सुकीर्ति बुद्धि शालिनः।
पुनश्च सो निजात्म भक्तिरंजितश्च नित्यशः 
समस्त कर्मणां विनश्य चादिवीरवद भवेद ।।२५।।

 

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